- डॉ.रामजी तिवारी
प्रवाह-पतित होकर बहते जाना स्वत्वहीन व्यक्तित्व का लक्षण है। मूल्यनिष्ठ संकल्प से स्खलित, आत्मविश्वास से विरहित, साहस और संकल्प से शून्य तथा मेरुदंडहीन व्यक्ति हवा के रुख की ओर मुख करने में ही सुविधा का अनुभव करते हैं। ऐसे बहुत कम लोग होते हैं जो मूल्यों, आदर्शों, भावनाओं और मंगल विधान की प्रेरणा से समस्त अवांछित अवरोधों को चुनौती देने के लिए परिकरबद्ध हो जाते हैं। ऐसे लोग संख्या में चाहे कितने ही अल्प क्यों न हो अंततः उन्हीं का व्यक्तित्व और कृतित्व वंदनीय और अनुकरणीय होता हैं। कविवर श्री मधुकर गौड़ उन्हीं थोड़े से लोगों में थे जो साधन, सहयोग और सुविधा के नितांत अभाव में भी अपनी ध्येयधर्मी धुन के साथ अविचल भाव से निरंतर आगे बढ़ते रहे।
श्री गौड़ जी कविता में भाव, रस, लयात्मक प्रवाह के साथ सुरुचि-संपन्नता के समर्थक एक संवेदनशील और सफल गीतकार थे। काव्य साधना आपके लिए तप:पूत आराधना के समान थी। आप काव्य में उदात्त भावभूमि और सामाजिक संसक्ति के साथ कलात्मक संयम को आवश्यक मानते थे। आपके अनुसार कविता की सार्थकता इस बात में है कि वह सद्भाव, सुसंस्कार, मर्मानुभूति और आनंद की प्रदात्री बने, हम अपनी पीड़ा अथवा आह्लाद का प्रतिबिंब उसमें देख सवेंâ। उसके साथ तदाकार होकर कुछ क्षण के लिए लोक चेतना की उदात्त भूमि पर पहुंच सके। इस दृष्टि से आप काव्य में गेयता अथवा लयबद्ध नाद को अनिवार्य मानते थे।
नई कविता के पक्षधरों की बौद्धिक आग्रहों वाली घोषणाओं ने इनके स्थान पर ‘बुद्धिरस’ और शब्द रचना की लयात्मकता के स्थान पर ‘अर्थ की लय’ की कल्पना कर के कविता की रस पर्यवसायी भाव सत्ता और उसकी सांगीतिक संपदा को आत्यंतिक रूप से खारिज कर दिया। चार दर्जन से अधिक काव्य आंदोलन खड़े हो गए। सभी आंदोलनों की अपनी-अपनी प्रतिज्ञाएं और घोषणाएं थीं। कविता के इस अराजक घटाटोप में नवगीत की एक क्षीण रजत रेखा हाशिए पर दिखाई दे रही थी। कवि कर्म बहुत सरल हो गया। संवेदनशील कवियों के लिए यह दुखद स्थिति थी। श्री मधुकर गौड़ भी काव्य-क्षेत्र की इस विपर्यस्तता से पीड़ित हुए। श्री गौड़जी मुंबई में निवास करते रहे। मुंबई अर्थप्रधान मायानगरी है। साहित्य-साधना के रास्ते में यहां असंख्य अवरोध और विपथ करने वाले प्रलोभन हैं। मुंबई ने हिंदी कविता को बुरी तरह प्रभावित किया। पूंजीपतियों के सहयोग से मुंबई में आयोजित होने वाले कवि सम्मेलनों में हास्य कवियों का प्रभुत्व बढ़ गया। परिणाम यह हुआ कि भाँडी हास्य कविताओं और अश्लील चुटकुलों को ही वास्तविक काव्य माना जाने लगा। संवेदनशील कवि और गीतकार स्वयं भी इन कुरुचिपूर्ण कवि सम्मेलनों से विमुख और उदासीन होने लगे।
इस महानगर का काव्य-मंच अकाव्यात्मक अभिव्यक्तियों का वेंâद्र बनने लगा। सुरुचि संपन्न श्रोता इन कार्यक्रमों से कटने लगे। केवल सस्ते मनोरंजन के आकांक्षी असाहित्यिक व्यक्ति ही इन कार्यक्रमों की शोभा बढ़ा रहे थे. इन काव्य मंचों में बड़ी निर्ममता से विदूषकों की भीड़ में कविता को काव्यत्व से हीन और काव्य मंच को हास्यास्पद बना दिया।
मुंबई महानगर में हिंदी कविता की इस दुरवस्था से पीड़ित होकर श्री मधुकर गौड़ ने हिंदी के संवेदनक्षम श्रेष्ठ काव्याभिव्यक्तियों की पुनप्रतिष्ठा के लिए गीत-गंगा के अरूद्ध प्रवाह को गति देने के लिए अपनी भगीरथ साधना आरंभ की। आपने ‘नगर-ज्योति’ का गठन करके इस महानगर को एक संस्कारशील, सुरुचिसंपन्न, विशुद्ध साहित्यिक मंच प्रदान करने के लिए अखिल भारतीय गीत संध्याओं का आयोजन करना आरंभ किया। यह प्रभाव के प्रतिकुल संघर्ष का चुनौतीभरा कार्य था। इस समानांतर मंच को अनेक विरोधों, विघ्नों और बाधाओं का सामना करना पड़ा कींतु श्री गौड़जी का संकल्प इन चुनौतियों से और भी सतेज होता गया। सन् १९७६ से १९९० तक श्री गौड़जी निरंतर कवि सम्मेलनों का आयोजन करते रहे. इन पंद्रह वर्षों में ‘नगर-ज्योति’ के शुद्ध साहित्यिक आयोजनों से महत्वपूर्ण साहित्यिक अभिरुचि का संस्कार हुआ और साहित्यिक कविताओं में रुचि रखनेवाला एक विशाल श्रोतावर्ग तैयार हुआ।
कविता को जनता से जोड़ने के उद्देश्य से श्री गौड़जी ने मुंबई के उपनगरों में कवि सम्मेलन आयोजित करने आरंभ किये। मालाड, गोरेगांव, विलेपार्ले, घाटकोपर, बांद्रा जैसे उपनगरों में आयोजित, कवि सम्मेलन श्रोताओं द्वारा मुक्त कंठ से सराहे गये। ‘नगर ज्योति’ की वह उपनगरीय यात्रा जब नगर में पहुंची तो इसकी उज्ज्वल परंपराओं का सुदृढ़ और सार्थक इतिहास बन चुका था। सुखद परिणाम यह हुआ कि कविता के क्षेत्र में व्याप्त, निगतिगामी प्रवृत्तियां अपने आप शामिल होने लगी और श्री गौड़जी के सफल नेतृत्व में सत्काव्य की चिरपोषित वाचिक परंपरा सतपथ पर अग्रसर हुई। इस रूप में हिंदी काव्य की मंचीय परंपरा में गौड़जी का प्रदेय मुंबई महानगर में सदैव ही अविस्मरणीय रहेगा।
लगभग १९७१ से २०१९ तक पांच दशकों से श्री मधुकर गौड़ अपने निरंतर लेखन, संपादन और संयोजन द्वारा साहित्य की सेवा कर रहे थे। अदम्य साहस और अकंप आस्था की पूंजी लेकर लगातार पंद्रह वर्षों तक ‘नगर-ज्योति’ के माध्यम से साहित्य-सेवा करते रहे। तीस वर्षों तक आप ‘सार्थक’ पत्रिका के माध्यम से महत्वपूर्ण साहित्यिक प्रश्नों से जुझते रहे। ‘सार्थक’ (हिन्दी जगत की छंद समर्पित एक चर्चित पत्रिका जो गत ३० वर्षों से निरन्तर प्रकाशित होती रही) श्री गौड़जी के व्यक्तिगत प्रयासों का फल था। ‘सार्थक’ के माध्यम से श्री गौड़जी साहित्यिक आंदोलनों पर विचार करते रहे और अपनी सीमा में गीत विधा को प्रोत्साहित करते रहे। सार्थक की प्रतियां अखिल भारतीय स्तर पर गीत विधा का विश्वसनीय इतिहास प्रस्तुत करती हैं। इसी के माध्यम से आप अपनी साहित्यिक मान्यताओं को प्रस्तुत करते रहे हैं। इसी के माध्यम से आपने ‘गीत नवांतर’ अथवा ‘छंद नवांतर’ के नाम से एक मौलिक अवधारणा प्रस्तुत की है। ‘सार्थक’ के ‘छंद नवांतर’ विशेषांक भी प्रकाशित किए हैं। इन विशेषांकों में ‘नवांतर’ संज्ञा की सार्थकता को स्पष्ट करते हुए बताया गया है कि कालक्रम के प्रभाव से घटित होने वाले परिवर्तनों में वस्तु और शिल्प के अंतरघटित होते हैं। यह अंतर ही वास्तविक नवता है। इसलिए ‘नवांतर’ संज्ञा प्रत्येक परिवर्तन के साथ अपनी सार्थकता बनाए रखेगी। पूरे देश के साहित्यकारों ने निष्पक्ष रूप से इस स्थापना को अपनी स्वीकृति भी प्रदान की है। आपने बीसवीं सदी के श्रेष्ठ गीतकारों की रचनाओं का एक संग्रह भी संपादित किया है। यह संग्रह अपनी अनेक विशेषताओं के कारण संग्रहणीय है। आप स्वयं एक सफल गीतकार हैं और निरंतर लिखते रहे हैं। अब तक आपके १९ गीत संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं तथा २१ ग्रंथों का सफल संपादन आपके द्वारा किया गया है। गीतों के अतिरिक्त आप समीक्षात्मक और वैचारिक लेखन भी लिखते हैं। कुल मिलाकर यदि देखा जाय तो श्री मधुकर गौड़ का संपूर्ण जीवन एक समर्पित साहित्य सेवी और तपस्वी साहित्य साधक का जीवन है।
कविवर मधुकर गौड़ प्रचार-प्रसार और दलगत राजनीति से असंपृक्त एकांत साधक हैं। आप क्रिया धर्म में विश्वास करते हैं और मनोवांछित कार्यों के कुशल संपादन में ही हार्दिक संतोष का अनुभव करते हैं। ‘योग: कर्मषु कौशलम्’ का सिद्धांत ही आपका वरेण्य सिद्धांत है। कविवर मधुकर गौड़ समकालीन हिंदी कवियों और काव्य चिंतकों के बीच अत्यधिक लोकप्रिय और सम्मानित हैं। आपकी अविराम साहित्य सेवाओं को हिंदी जगत बड़ी गंभीरता से स्वीकार करता है।
इन लेखकों में कवियों और काव्य प्रेमियों की तीन पीढ़ियों का समावेश है। श्री गौड़जी के प्रति जो आत्मीय स्नेह पुरानी पीढ़ी के मन में है वही आदर भाव नई पीढ़ी के मन में भी है। सभी पीढ़ी के लेखकों ने बड़ी आत्मीय सदभावना से श्री गौड़ जी की मूल्यनिष्ठा, सृजनशील प्रतिभा और नीर-क्षीर विवेकी प्रवृत्ति की सराहना की है। इस व्यापक स्वीकृती का मुख्य कारण श्री गौड़जी की तत्वाभिनिवेशी दृष्टि का अविचल स्थायित्व रहा। आप किसी अल्पजीवी प्रचारधर्मी आंदोलन से नहीं जुड़े, किसी आंदोलन के नेतृत्व के मोह में नहीं पड़े, प्रवाह पतित होकर अवसर का लाभ उठाने के लिए आतुर नहीं हुए बल्कि सारे संभाव्य प्रलोभनों से अनासक्त रहकर ‘गीत’ का मुकुट हाथ में ऊपर उठाये पूरी निष्ठा और अवंâप आस्था के साथ बिना विचलित हुए बहुविध यातनाओं को झेलते रहे। आरंभिक गीत-सृजन से लेकर गीत-नवांतर तक के सैद्धांतिक विमर्श तक आप गीत विधा के मूलभूत सनातन तत्वों की प्रतिष्ठा में लगे रहे। विवादों के वितंडावाद और विरोधों के झंझावात आपको रंचमात्र भी विचलित न कर सके।
आपकी सृजनशीलता, मूल्यनिष्ठ काव्य-दृष्टि, गीत विधा के प्रति निर्विकल्प समर्पणशीलता, काव्य की लोकाभिमुखता, वस्तुनिष्ठ एवं अनाहत संकल्पशीलता, सामाजिक संयुक्ति और संपादकीय कुशलता विशेष उल्लेखनीय है। श्री गौड़ मूलतः एक संवेदनशील कवि थे। काव्य-सृजन आपकी सहज प्रवृत्ति थी। आपका आंतर व्यक्तिवेद्य जब सर्वजन संवेद्य होकर अभिव्यक्ति के लिए आकुल होता है तब कविता अनायास ही आकार ग्रहण कर लेती है। सृजन ऊर्जा और सृजनशील कल्पना की उद्दामता में भी आपकी रचनाएं विशेष दायित्व चेतना और ध्येय धर्मिता से विरत नहीं होती। यही कारण काव्य क्षेत्र में बढ़ती अराजकता और स्तरहीनता आपको व्यथित करती थी। आप जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अधिकार को कर्तव्य का आश्रयी मानते थे।
श्री मधुकर गौड़ के लिए साहित्य-साधना बैठे ठाले का काम न होकर विश्वमंगल के महान उद्देश्य से की जाने वाली संकल्पशील तपस्या है। श्री गौड़जी का साहित्य सृजन इस आदर्श का पुष्ट प्रमाण है।
उत्तरशक्ति में अनेक काव्यांदोलन उभरे । स्व.डॉ.जगदीश गुप्त ने चार दर्जन काव्यांदोलनों के नाम गिनाये हैं। इन आंदोलनों में व्यक्ति स्थापन और प्रचार धर्मिता का ही प्राधान्य रहा है। श्री गौड़जी इन सभी तथाकथित आंदोलनों के प्रत्यक्षदर्शी रहे हैं। अकाव्यात्मक प्रयोगों और विवेकहीन आग्रहों के भीतर छटपटाती कविता की करुण त्रासदी देख कर श्री गौड़जी का कवि मन मर्माहत होता रहा। आप किसी भी आंदोलन के अनुगामी न होकर ‘एकला चलो’ का व्रत लेकर, कंटकाकीर्ण काव्य-पथ के परिष्कार में यथाशक्ति लगे रहे। आपके सामने कलात्मक संयम से सिद्ध सतकाव्य का लक्ष्य था। परिणाम यह हुआ कि बरसाती घास की तरह जन्मे, असंख्य आंदोलनों के अकाल काल कवलित हो जाने पर श्री गौड़जी का व्यक्तित्व स्वयमेव आलोक दीप्त हो गया। ‘गीत’ से लेकर ‘गीत नवांतर’ तक की अविराम यात्रा में निर्हित काव्य-विवेक और कविता के आद्योपांत संसक्त व्यक्तित्व उजागर हो गया। अनेक विद्वानों ने श्री गौड़जी के इस वैशिष्ट्य को रेखांकित किया है।
श्री मधुकर गौड़ की अनेक मौलिक कृतियां प्रकाशित हो चुकी है। इनमें से अनेक को सम्मानित और पुरस्कृत किया गया है।
निरंतर गतिशीलता को जीवन मानने वाले श्री मधुकर गौड़ की सृजनशीलता की गुणात्मक और मात्रात्मक उपलब्धियों का आधार उनका यह ध्येयधर्मी संकल्प है -
चल नदी के पार / झरनों की हथेली पर
जिंदगी पहिया है तेरी / रास्ते हैं घर,
अक्षरों के अर्थ की / समिधा नहीं बिकती
यह कहानी तो हमें / अपनी नहीं लगती,
छू सृजन की चोटियों को / फिर ढलानों पर उतर
जिंदगी पहिया है तेरी रास्ते हैं घर।
एक प्रश्न उठता है। श्री गौड़जी की कृश काया में इतनी अपार शक्ति और साहसिकता का रहस्य क्या है? उत्तर मिलता है उनकी मूल्य-निष्ठा, मानव-प्रेम और गीत के साथ रागात्मक अनुबंध। मूल्य निष्ठ होने के लिए प्रलोभन और भय से मुक्त होना अनिवार्य है। मूल्यनिष्ठ व्यक्ति टूट तो सकता है लेकिन झुक नहीं सकता। ऐसे व्यक्ति ही मानवता की उपासना में सर्वस्व सहर्ष त्याग कर सकते हैं, बड़ी से बड़ी शक्यिों से टकरा सकते हैं। ऐसे व्यक्तियों का व्यापक प्रेम इंसान को ईश्वर के आसन पर बिठा देता है।
श्री गौड़जी स्पष्ट शब्दों में कहते हैं -
मेरी पूजा जन जीवन है मेरा तीरथ हिन्दुस्तान,
मेरा प्यार सभी के हक में मेरा ईश्वर है इंसान ।।
श्री गौड़जी मानते थे कि नया इतिहास लिखने की शर्त है लहू के साथ चलना। कुछ विशे, करने पर ही किसी रचनात्मक परिणाम की आशा की जाती है। अवांछित यथास्थिति अर्थात् जड़ता को काटने के लिए क्रियाधर्म को अर्थात शीलाचारिकी को अपनाना अनिवार्य है। सत्यनिष्ठा शील में संयुक्त होकर उपकारक सिद्ध होता है।
संपूर्ण संसार को सौरभसिक्त बनाने के आकांक्षी श्री गौड़जी का व्यक्तित्व छंद, लय और रस से भरी गागर के समान है जो अपनी आद्र्र संवेदना से विश्व मानवता को सींचने के लिए सदैव आतुर रहता है। आपका संपूर्ण सृजन इन्हीं गुणों से युक्त गीत की कहानी है। गीत की कहानी का निरंतर गायन गौड़जी का प्रथम और अंतिम लक्ष्य है। उनका कहना था -
गाते गाते गीत मरूं मैं, मरते मरते गाऊं।
तन को छो़डू भले धरा पर, गीत साथ ले जाऊं ।।
गीत के प्रति गौड़जी की यह निर्विकल्प निष्ठा और समपर्वâ वृत्ति ही उनकी अजेय और अथक शक्ति का मूलाधार है।
सुचि विद्वानों ने गौड़जी की सृजन और संयोजन की विशिष्ट क्षमताओं के साथ उनके संपादन कौशल की भी सशक्त रूप से भूरि-भूरि प्रशंसा की है। सृजन और संपादन दो विशिष्ट प्रतिभाओं की अपेक्षा रखते थे। दोनों कार्यों में समान दक्षता अपवादात्मक ही होती है। इस दृष्टि से श्री गौड़जी अपवाद ही थे। आप जितने सफल सर्जक थे उतने ही कुशल संपादक भी। सृजन और संपादन दोनों में जो चीज उभयनिष्ठ है, वह है साहित्य-विवेक, श्रमशीलता, मूल्यनिष्ठा और ध्येय धार्मिता। श्री गौड़जी के सृजन, संयोजन और संपादन में इन विशेषताओं को स्पष्टतः लक्षित किया जा सकता है। श्री गौड़जी का संपादन कार्य साहित्य सेवा के पुनीत उद्देश्य से प्रेरित रहा है। दुर्लभ और श्रमसाध्य कार्य आपकी गीत यात्रा का शिखर-बिंदु है। आपके कुशल संपादकत्व में ‘गीत नवांतर’ के यशस्वी पांच संकलन प्रकाशित हो चुके हैं। ये अंक गीत विधा की अद्यतन स्थितियों का प्रामाणिक लेखा-जोखा प्रस्तुत करते हैं। इन संग्रहों के साथ ही वर्षों से श्री गौड़जी गीत विधा के प्रति समर्पित पत्रिका ‘सार्थक’ का संपादन करते रहे। इसमें प्रस्तुत होनेवाली सार्थक चर्चाओ, समीक्षाओं और सैद्धांतिक विमर्शों द्वारा महत्वपूर्ण साहित्यिक प्रश्नों पर विचार होता रहा है। पाठक ‘सार्थक’ के अंकों की व्यग्र प्रतीक्षा करते हैं। ध्यातव्य यह भी है कि श्री गौड़जी यह सारा कार्य बिना किसी स्थायी आर्थिक स्रोत के पूरा करते रहे। अर्थात् प्रत्येक सोपान पर आपको आर्थिक मोर्चे पर भी जूझना पड़ा। इन तथ्यों के आलोक में श्री गौड़जी का व्यक्तित्व प्रेरणास्पद और अनुकरणीय बन गया था।
चुरु, राजस्थान में १० अक्टूबर १९४२ को जन्मे श्री मधुकर गौड़ रोजी-रोटी की तलाश में मुंबई आएं। सुख-सुविधा के असंख्य सम्मोहनों और प्रलोभनों की इस मायानगरी में साहित्यिक प्रतिभाओं का संरक्षण और संवर्धन प्रायः असंभव है। अर्थ की मृग मरीचिका यहां के जीवन को अस्थिर, अशांत और यंत्रवत बना देती है। साहित्य साधना के लिए अपेक्षित संवेदनशीलता, कल्पना, प्रवणता, एकाग्रता और चिंतनशीलता प्रायः शुष्क हो जाती है। श्री गौड़जी भी मुंबई के इसी वातावरण में प्रविष्ट हुए। परिस्थिति और व्यक्तित्व के टकराव की दो परिणतियां होती हैं। दुर्बल व्यक्ति परिस्थिति का शिकार हो जाता है किंतु सबल व्यक्तित्व अपने पुरुषार्थ से परिस्थिति को अपने अनुकुल बना लेता है।
श्री गौड़जी जन्मजात कवि थे। प्रत्येक अभावात्मक और गतिरोधी स्थिति से टकराना तथा रचनात्मक विकल्पों का संधान करना कवि का स्वभाव होता है। वह स्वयं प्रजापति का समानधर्मा होता है इसलिए बाह्य परिस्थिति को अपने अनुवूâल बनाने का संकल्प लेता है। श्री गौड़जी भी मुंबई की अर्थप्रधान संवेदनशून्य संस्कृति में सार्थक जीवन का विकल्प खोजने लगे। उपेक्षित मानवीय मूल्यों की पुनप्र्रतिष्ठा के लिए अपने आस्तिक आस्था की मशाल लेकर गीतों के राममय पथ का अनुसरण किया। इस जय यात्रा की प्रत्येक चुनौती श्री गौड़जी की आत्मशक्ति और संकल्पनिष्ठा को अधिकाधिक बलवती बनाती रही। संयोजन, सृजन और संपादन द्वारा आप साहित्य की श्री वृद्धि करते रहे। धनाभाव, जन असहयोग और शारीरिक अस्वस्थता आपको रंचमात्र भी विचलित या शिथिल न कर सकी. आपकी भगीरथ साधना ने गीत गंगा के पथ को प्रशस्त किया। अतुकांत और अराजक कविता के बीहड़ में आप छांदस काव्याभिव्यक्ति के लिए एक समर्थ छंद संस्था बन गये।