महाराष्ट्र राज्य हिन्दी साहित्य अकादमी से दो बार काव्य के सर्वोच्च पुरस्कारों से पुरस्कृत। राजस्थान साहित्य अकादमी उदयपुर से विशिष्ठ साहित्यकार सम्मान। राजस्थानी भाषा, साहित्य, संस्कृति अकादमी बीकानेर से काव्य का सर्वोच्च पुरस्कार प्राप्त। ५१ हजार रू. का महावीर प्रसाद जोशी पुरस्कार, अक्टूबर २०१६ हिंदी साहित्य सम्मेलन प्रयाग से ‘साहित्य सारस्वत’ सम्मान एवं अन्य अनेक पुरस्कार
मधुकर गौड़ का सार्थक साहित्य
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मधुकर गौड़ का जीवन वृत्त

जन्म, जन्मस्थान और माता-पिता-
कविवर मधुकर गौड़ का जन्म गौड़ ब्राह्मण-परिवार में 10 अक्टूबर 1942 को चुरू (राजस्थान) में दादा श्री पं॰गोवर्द्धन दास के परिवार में हुआ। बालक मधुकर गौड़ के पिता का नाम श्री इन्द्रचन्द्रजी गौड़ और माताश्री का नाम श्रीमति नानीबाई हैं। इनके दादा-दादी और माता-पिता सनातन धर्मी और वैदिक मान्यताओं को माननेवाले थे। जहाँ दादाश्री और माताश्री आदर्श भारतीय महिला तथा धार्मिक मनोवृत्ति की थीं, वहीं दादाश्री और पिताश्री संस्कृत के ज्ञाता, कर्मकाण्डी ब्राह्मण और ज्योतिष के कुशल ज्ञाता थे।

पारिवारिक पृष्ठभूमि-
गीतकार मधुकर गौड़ की पारिवारिक पृष्ठभूमि में राजस्थानी-परम्पराएँ, रीति-रिवाजों, पराक्रमों और शौर्य की विशिष्ट पृष्ठभूमि जुड़ी है। राजस्थान की बलिदानी शौर्य-परम्पराओं ने उनके जीवन और व्यक्तित्त्व को ही नहीं प्रभावित किया है, अपितु उनका समूचा कृतित्त्व भी इससे प्रभावित है। श्री मधुकर गौड़ के दादाश्री- पं॰ गोवर्द्धनदास अपने समय के संस्कृत निष्ठ ब्राह्मण और कर्मकाण्ड के गहन चिन्तक थे। वे वैदिक ज्ञान के भण्डार थे। चुरू (राजस्थान) में वे ज्योतिष के लिए भी जाने जाते थे। पिताश्री भी संस्कृत के ज्ञाता थे। मधुकरजी को जन्म से संकट और विभन्न स्थितियों से साक्षात्कार करना पड़ा, क्योंकि उनके पिताश्री का देहावसान उनके बाल्यकाल में ही हो गया था। बचपन में पिताश्री का देहावसान, ऊपर से जीविका का संकट, माताश्री पर भीषण बज्रपात, तिस पर पुत्र के लालन-पालन का चुनौतीपूर्ण दायित्व-ये विषमतापूर्ण दारूण स्थितियाँ, जिन्होंने जन्म से बालक को झिंझोड़कर रख दिया। निस्सन्देह, इसी विकटतम पारिवारिक पृष्ठभूमि ने बालक ‘मधुकर गौड़’ के भावी जीवन का निर्माण किया।
संयुक्त परिवार था। बचपन में ही पिता की छाया सर से उठ गयी। जब संभले तो दुःखभरी मुस्कानों ने स्वागत किया, सहेजा और रास्ता दिखाया, तभी से संघर्ष, परिश्रम, संकल्प ने साथी बनकर जीवनभर साथ निभाया । किसी तरह शिक्षा ग्रहण करने की लालसा ने संबल प्रदान किया और उनके संकल्प, साहस ने उन्हें अंधेरों से लड़ने का बल प्रदान किया।
शिक्षा-दीक्षा-
श्री मधुकर गौड़ का बाल्यकाल उनके माता-पिता, दादा-दादी की गोद में ही व्यतीत हुआ। फलतः उनकी प्राथमिक शिक्षा का शुभारम्भ भी पारिवारिक-परम्पराओं के अनुसार हुआ। इनके दादाश्री और पिताश्री वेदों के ज्ञाता थे। कर्मकाण्डी सनातनी ब्राहमण थे। उन्हें संस्कृत से गहरा प्रेम था। राजस्थानी मिट्टी की परम्पराएँ और शौर्य उनके रग-रग में रचे-बसे थे। इन्हीं के बीच बालक मधुकर गौड़ का लालन-पालन भी हुआ। दादाश्री- पं॰ गोवर्द्धनदासजी और पिताश्री इन्द्रचन्द्रजी गौड़ की देख-रेख और दिशा-निर्देशन में उनकी आरम्भिक शिक्षा हुई जो केवल बागला हाईस्कूल, चुरू में ही केवल मैट्रिक तक हुई। श्री मधुकर गौड़ को संस्कृत भाषा और साहित्य का जहाँ विशिष्ट ज्ञान था वहीं राजस्थानी परम्पराओं और रीति-रिवाजों की महक उनकी रग-रग में समायी थी। लेकिन दुर्भाग्य कि छोटी-सी उम्र में उनके पिताश्री और दादाश्री का देहावसान हो जाने से घर-परिवार की आर्थिक स्थिति न केवल चरमरा गयी अपितु मैट्रिक के बाद शिक्षा भी रुक गई क्योंकि तब वे दस वर्ष के थे। श्री मधुकर गौड़ ने अपनी तत्कालीन परिस्थितियों का उल्लेख अपने एक साक्षात्कार में कुछ इस प्रकार किया है-‘‘प्रारम्भिक काल में मेरे जीवन में सबसे महत्त्वपूर्ण बात थी मेरी अपनी पारिवारिक स्थिति को संभाल सकना। दस वर्ष की उम्र में ही मेरे पिता का देहांत हो गया था। माता बड़ी साहसी, परिश्रमी और आध्यात्मिक नारी रही हैं और घर के बोझ को अपने कंधे पर उठा लेने के लिए हर बार मैं यत्न करता रहा। दुःखों से अक्सर आमना-सामना होता ही रहता। इस बीच शायद कविता ही मुझे अकेले में सांत्वना और साहस प्रदान करती। 18 वर्ष की उम्र में मैं किसी छोटे स्कूल का शिक्षक बन गया था। हाईस्कूल के बाद पढ़ पाना मेरे लिए अत्यधिक दुष्कर था, आजीविका के लिए शिक्षण के बाद मैं मुम्बई आया। 20 की उम्र में महानगर में आ गया था। उन दिनों नौकरी की तलाश तो थी ही, साथ ही कविता के होल-झोल से भी जुड़ने में लगा रहा। महानगर मुंबई में अनेक संस्थाएँ थीं जो राजस्थानियों द्वारा बड़ी हार्दिकता से स्थापित की गयी थीं। उनके माध्यम से अनेक कवि सम्मेलन आदि के आयोजन होते और मैं उनमें कवितापाठ करता रहा।वहाँ के अन्य भाषाई लोगों के साथ-साथ राजस्थानी परिवारों के कुछ विशिष्ट लोगों से भी मेरा जुड़ाव हुआ। अध्ययन की दृष्टि से मारवाड़ी पुस्तकालय में बैठे हुए श्री मदनलाल जालान अपने किसी कार्य से वहाँ आये हुए थे, उन्होंने देखा और पूछा-‘दोपहर के समय आप यहाँ कैसे? मैंने उन्हें नजदीक खड़ा देखकर अपने उत्तर को स्वयं प्रश्न बनाते हुए कहा- ‘क्यों साहब, स्थान तो अच्छा है, अध्ययन शील व्यक्ति हूँ और ब्राह्मण भी, सो ज्ञान की लालसा पूरी करने में लगा हूँ।’’ वे बड़े प्रसन्न हुए लेकिन राजस्थानी भाषा में ही फिर प्रश्न दागा- ‘रोटी पानी का क्या? ’मैंने कहा-जी वह भी मिल जायेगी। वे तुरन्त समझे और दूसरे दिन से ही अपनी जालान मिल में आने का न्यौता दे गये। मैं एकाउण्टैण्ट बन गया। और न जाने क्यों फिर भाग्य ने जोर मारा और मैं एक-डेढ़ माह के बाद ही वहाँ से बिड़ला समूह के सबसे बड़े प्रतिष्ठान ‘सेंचुरी रेयान’ के हेड़ ऑफिस में लग गया और लगातार 35 वर्ष तक उस परिवार और प्रतिष्ठान का स्नेह पाता रहा। स्वतः की इच्छा से ही एक दिन मैंने स्वयंको अलग कर लिया- मन में यह ठानकर कि अब संपूर्ण रूप से साहित्य की सेवा ही करूँगा।’’ इस प्रकार, केवल ‘मैट्रिक’ तक शिक्षा प्राप्त करके माँ सरस्वती के इस अनन्य साधक ने अपनी छोटी-सी आयु में ही न केवल नौकरी आरम्भ की अपितु निरन्तर 35 वर्षों तक सेवाकार्य करते हुए अपने पारिवारिक दायित्वों का भरण पोषण भी किया।
श्री मधुकर गौड़ के दाम्पत्य जीवन का प्रारंभ 13 मई सन् 1964 से हुआ, जब उनका विवाह ‘सुश्री पानादेवी’ से सम्पन्न हुआ। श्रीमती पानादेवी गौड़ से आपको चार रत्नों की प्राप्ति हुई-
1. कु. कविता शर्मा
2. चिरं. कमलेश गौड़
3. कु. सविता शर्मा
4. कु. मंजू
आपने चारों बच्चों को न केवल उच्चशिक्षा से सम्पन्न कराया, अपितु उच्चशिक्षित एवं सम्पन्न परिवारों में उनके विवाह भी यथा समय सम्पन्न किए।

काव्य सृजन की प्रेरणा एवं प्रभावः-
काव्य-सृजन की प्रेरणा बालक मधुकर गौड़ को अपने दादाश्री पं॰गोवर्धनदास से विशेष रूप से मिली। साथ ही नानाश्री पं॰ भूरामलजी का भी आपके बचपन पर यथेष्ठ प्रभाव पड़ा। नानाश्री को संस्कृत, हिन्दी और राजस्थानी का अच्छा ज्ञान था। वे कर्मकाण्डी, सनातनी ब्राहमण थे। ज्योतिष विद्या के भी अच्छे ज्ञानी थे। जहाँ तक दादाश्री पं॰ गोवर्धनदास के प्रभाव का प्रश्न है वे अद्भुत सांस्कृतिक पुरूष थे। संस्कृत के प्रकाण्ड पंडित, वेदों के अध्यवसायी और ज्योतिष के ज्ञाता थे। स्वयं श्री मधुकर गौड़ ने एक साक्षात्कार में लिखा है-‘‘परिवार में मेरे दादाजी कविता और संगीत में विशेष रूचि रखते थे। वे अक्सर अपने साथियों के साथ शहर में मंचों पर लोकगीत गाते और उनके साथ नृत्य करते और नाटिकाओं को सम्मान दिया करते थे। शायद मैं इन्हीं के इस कृत्य से आत्मिक रूप से झंकृत हुआ होऊँगा। मेरे पिता के बड़े भाई अर्थात् ताऊजी ने पूरे शेखावाटी अंचल में सर्वप्रथम एक साप्ताहिक पत्र का प्रकाशन किया। दीपावली के उनके किसी विशेषांक में ‘चेतनादीप’ नाम से पहली बार मेरी रचना प्रकाशित हुई, पत्र का नाम ‘साप्ताहिक तूफान’ था।’’ इस प्रकार बालक मधुकर गौड़ ने अपने ‘दादाश्री’ से काव्य-सृजन की प्रेरणा प्राप्त की। श्री मधुकर गौड़ ने एक ‘अन्य साक्षात्कार’ में भी यही तथ्य प्रबल रूप से पुनः दोहराया है। एक प्रश्न के उत्तर में उनका यह कथन भी दृष्टव्य है -‘‘जहाँ तक कविता के मानसिक स्तर और भावनात्मक स्तर तक आने की बात है, इसे एक उत्तराधिकारी के रूप में ही अधिक महत्त्व देता हूँ। मेरे दादा बहुत अच्छी कविता लिखा करते थे और उस जमाने में उस समय के मंचों पर सामाजिक परिवेश से उलझी हुई, सामाजिक असंगतियों को भी वे कविता के माध्यम से उस जमाने की नृत्य-नाटिका के रूप में प्रस्तुत किया करते थे। इसे हम खून के रिश्ते की कविता भी कह सकते हैं। मैं नहीं जानता कि इससे अधिक किसी और से मुझे कोई प्रेरणा मिली है। कई-बार स्कूल में जब हर शनिवार को छात्रों की विशेष सांस्कृतिक सभा हुआ करती थी, तब मैंने एकाध बार स्वयं की लिखी हुई कुछ पंक्तियाँ उस आयोजन में पढ़ दी थीं। उनसे प्रभावित होकर उस समय के विद्वान और जुझारू साहित्यकार जो हमारे हिन्दी के शिक्षक भी थे, श्री कुंजबिहारी शर्मा की नजरें मुझ पर टिकीं और उन्होंने उसके बाद से मुझे बार-बार लिखने की प्रेरणा दी उन दिनों में कई रचनाकारों से अलग-अलग रूप मेंअलग-अलग समय पर किन्तु कभी-कभी, अवश्य प्रभावित होता रहा हूँ। उनमें है -बलवीर सिंह रंग, मुकुट बिहारी ‘सरोज’ रामावतार त्यागी और दिनकर जी की ओजस्वी कविताएँ।’’

व्यक्तित्त्व की विधायक तत्त्वः-
किसी भी व्यक्ति के जीवन की परिस्थितियाँ उसके व्यक्तित्त्व का निर्माण करती हैं। गीतकार मधुकर गौड़ के साथ भी ऐसा ही हुआ है। वे चुरू (राजस्थान) में जिस परिवार में उत्पन्न हुए वह ज्ञान व विद्रत्ता की दृष्टि से अद्वितीय रहा है। लेकिन आर्थिक दृष्टि से उतना सम्पन्न नहीं रहा।
बाल्यकाल में दादाश्री और पिताश्री की अचानक मृत्यु हो गयी। फलतः परिवार की आर्थिक स्थिति न केवल चरमरा गयी, अपितु रचनाकार श्री मधुकर गौड़ को बीच में ही अपनी शिक्षा-मैट्रिक के साथ ही बन्द कर देनी पड़ी और वे अपनी मौसीजी के पास मुम्बई आ गये, जहाँ उन्होंने न केवल भविष्य की सुदृढ़ आधारशिला रखी, अपितु कविता को भी समर्पित हो गये।
वस्तुतः बचपन में ही अनायास आये आर्थिक अभावों और अवरोधों ने उनके जीवन को संघर्षमय बना दिया। फलतः उनका व्यक्तित्त्व भी वैसा ही बनता चला गया। जीवनगत संघर्ष की छाप उनके व्यक्तित्त्व में स्पष्टतः दिखायी देती। उनकी ये पंक्तियाँ देखें-
‘‘मैंने पीये दर्द घनेरे,
अनगिन बीते सांझ-संवेरे।
जीवन का कुछ क्रम ही ऐसा,
स्वप्न अधूरे, तेरे-मेरे।।’’


‘कब से गाता हूँ गीतों में’
अपनी अदम्य साहसिक मनोवृत्ति और संकल्प शीलता के साथ श्री मधुकर गौड़ जीवन-पथपर आगे बढ़ते चले गये। यही नहीं, अपने व्यक्तित्त्व की महत्ता के साथ विनम्रता और मूल्य निष्ठा तथा अकंप आस्था को उन्होंने नहीं छोड़ा और अपने पारिवारिक एवं सामाजिक दायित्वों को भी बखूबी निभाया। उनकी भावना ‘आस का कंवल’ नामक गीत की इन पंक्तियों में देखें-
‘‘पांव धीरे धरो, पर चलो वेग से,
इस तरह हर नया मोड़ मिल जायेगा।
लड़खड़ाओं कहीं तो संभलते रहो,
आस का हर कंवल फिर से खिल जायेगा।।’’

आस्थायें स्वयं की ही काम आयेंगी,
बर्फ से पांव जबभी पिघल जायेगा।
पाँव धीरे धरो पर चलो वेग से,
इस तरह हर नया मोड़ मिल जायेगा।।’’

निस्सन्देह, उनकी जीवन दृष्टि और चीजों को समझने की उनकी मेधावी वृत्ति ने उन्हें जहाँ सादगी दी, वहीं उन्हें निडर, साहसी, विनम्र, संवेदनशील, नीर-क्षीर-विवेकी और सत्यनिष्ठ भी बना दिया। उनके व्यक्तित्त्व का यह रूप इस ‘मुक्तक’ में देखें-
‘‘एक आदत-सी है मुझमें बांकपन की,
टूट जाता हूँ मगर, झुकता नहीं हूँ।
स्नेहवश आंको अगर बिन मोल लेलो,
किन्तु सिक्कों के लिए बिकता नहीं हूँ।।’’

श्री मधुकर गौड़ के व्यक्तित्त्व के निर्माण में उनके जीवन की परिस्थितियाँ ही विशिष्ट रूप से उत्तरदायी रही हैं। यह बात निस्सन्देह सत्य है कि उनके व्यक्तित्त्व ने उन परिस्थितियों से कभी हार नहीं मानी, अपितु कठिन परिश्रम और ईमानदारी के साथ उनसे संघर्ष किया और अपने व्यक्तित्त्व से जनमानस को प्रभावित किया है। वस्तुतः जो भी उनसे मिला। उनसे प्रभावित अवश्य हुआ। समग्र मानवता के पुजारी और सांस्कृतिक चेतना से परिपूर्ण उनके व्यक्तित्त्व को समर्पित है, उनकी ही रचना ‘बीर बांकुरे’ की ये पंक्तियाँ दृष्टव्य हैं-
‘‘कुछ ऐसे हैं फूल की जिनकी,
चर्चा चमन किया करता है।
कुछ ऐसे बलिदान हैं जिनको,
जग-भर नमन किया करता है।।’’

अदम्य साहसी, अकंपित आस्था के धनी, एकान्त साधक, मूल्यनिष्ठ, सृजनशील नीर-क्षीर-विवेकी, संकल्पशील, समर्पित व्यक्तित्त्व, संवेदनशील आदि विशिष्टताएँ, श्री मधुकर गौड़ के व्यक्तित्त्व में निहित हैं जिनका प्रादुर्भाव उनके व्यक्तित्त्व में पारिवारिक एवं सामाजिक परिस्थितियों के प्रभाव के फलस्वरूप हुआ है।

बहुआयामी काव्य-प्रतिभा और काव्य-यात्रा का समारम्भ-
श्री मधुकर गौड़ बहुमुखी साहित्यिक प्रतिभा के साहित्यकार हैं। उन्हें संगीत का भी ज्ञान है। उनका रचना-संसार बड़ा ही व्यापक है। उनके अनेकानेक काव्य-संग्रह और काव्य संकलन प्रकाशित हो चुके हैं। उनका समग्र लेखन उनकी बहुआयामी काव्य प्रतिभा के विविध आयामों का अनूठा भण्डार है। वस्तुतः उनके लेखन से गुजरकर ही उनकी बहुमुखी काव्य-प्रतिभा का अनुमान लगाया जा सकता है। डा॰ अश्व घोष, देहरादून (उत्तराखण्ड) ने श्री मधुकर गौड़ के बहुआयामी व्यक्तित्त्व के बारे में जो आकलन किया है, वह अत्यन्त सटीक है- ‘‘मधुकर गौड़ बहुआयामी हैं। वह लेखक भी हैं और सम्पादक भी। वह गीतकार भी हैं और ग़ज़लकार भी। वह आदमी भी हैं और इन्सान भी। उनमें गुस्सा भी है और संवदेनशीलता भी। उनमें आग भी है और नदी भी। मधुकर के गीतों में आम आदमी का दुःख दर्द इतनी संजीदगी से समाहित है कि उस पर जितना लिखा जाए कम है’’ ऐसे महान रचनाकार ने अपनी काव्य-यात्रा का समारम्भ बड़ी ही विविध एवं विषम स्थितियों में किया। दस वर्ष की आयु में उनके पिताश्री का देहावसान हो गया। संभवतः इसी बीच दर्द के साथ कविता के अंकुर उनके हृदय से अंकुरित हुए। कविता वाचक्नवी से हुए साक्षात्कार में कविवर मधुकर गौड़ ने अपनी काव्ययात्रा के बारे में स्वयं बताया भी है। प्रस्तुत है इसी साक्षात्कार के कुछ अंश-
कविता वाचक्नवी - आपने कब लिखना आरम्भ किया? पहली रचना किस विधा में कौनसी थी?
मधुकर गौड़ - पहली रचना मेरी गीत के रूपमें थी और शायद ‘चेतना के दीप’ के नाम से वह राजस्थान के सबसे पुराने पत्र ‘तू्फान’ साप्ताहिक में छपी थी।
कविता वाचक्नवी - क्या वय रहा होगा उस समय?
मधुकर गौड़ - मैं 15 का रहा होऊँगा।
वस्तुतः श्री मधुकर गौड़ ने पिताश्री की मृत्यु के उपरान्त विषम पारिवारिक स्थितियों में काव्य-सृजन का आरम्भ किया। उस समय दर्द, वेदना, पीड़ा उनके सृजन का उत्प्रेरक रहा होगा। 20 वर्ष की आयु में वे आजीविका के लिए मुंबई महानगर में आ गये। वहाँ पर आपको कविता के अनुकूल वातावरण भी मिला। पं॰ नरेन्द्र शर्मा सदृश साहित्यकारों का स्नेह वहाँ उन्हें प्राप्त हुआ। फलतः उनकी काव्य-यात्रा अबाध रूप से चलती रही। इसी अनवरत साधना के फलस्वरूप आज साहित्य जगत में श्री मधुकर गौड़ का एक प्रतिष्ठित स्थान है।